भारत के वनों पर एक भौगोलिक लेख

 किसी भी देश की प्रकृति प्रदत्त उपहार में प्राकृतिक वनस्पति का विशिष्ट स्थान होता है। प्राकृतिक वनस्पति से अभिप्राय उन पेड़ पौधों और घास से हैं जो स्वच्छंद रूप से उगते बढ़ते और नष्ट हो जाते हैं। भारत में समस्त क्षेत्र पर के लगभग पांचवें भाग पर प्राकृतिक वनस्पति का साम्राज्य है। जबकि संसार के अन्य देशों में वन का क्षेत्र विस्तार पर्याप्त से अधिक है। फिनलैंड के 75% क्षेत्र पर वन पाए जाते हैं। रूस का 45% भाग वनों से ढका हुआ है और कनाडा का एक तिहाई क्षेत्र पर वन मिलते हैं। 

भारत के वनों पर एक भौगोलिक लेख
भारत के वनों पर एक भौगोलिक लेख



भारत में प्राकृतिक वनस्पति के प्रकार

  1. उष्ण आर्द्र सदाबहार वन
  2. मानसूनी पर्णपाती वन
  3. मरुस्थलीय वन
  4. डेल्टाई वन या दलदली वनस्पति 
  5. पर्वतीय वन


उष्ण आर्द्र सदाबहार वन - यह वन भारत के ऊन भागों में मिलते हैं जहां 20 सेमी से अधिक वार्षिक वर्षा होती है। यह वर्ष भर हरे भरे रहते हैं। यह वन बहुत संघन होते हैं। बहुत से वृक्ष तो 60 मीटर से भी अधिक ऊंचे पाए जाते हैं। इनके ऊपरी सिरे छतरी नुमा होते हैं। नीचे अनेक प्रकार की लताएं उड़कर वर्षों से लिपट जाती है। इन वनों से गुजरना बहुत ही कठिन होता है। इन वनों में मुख्य वृक्ष महोगनी, ताड़, बेंत , सिनकोना इत्यादि है। इन वनों का विस्तार पश्चिमी तट तथा पश्चिमी घाट पर्वतों से पश्चिम ढलानों पर तथा पूर्वोत्तर हिमालय प्रदेश में है। इनका विस्तार मुख्यतः महाराष्ट्र ,केरल और असम राज्य के अंतर्गत मिलता है। 


मानसूनी पर्णपाती वन - भारत में यह वन उन भागों में मिलते हैं जहां 50 से 200 सेंटीमीटर तक वार्षिक वर्षा होती है। इन वनों के वृक्ष अधिकतम 15 मीटर ऊंचे होते हैं। ग्रीष्म ऋतु में यह अपनी पत्तियां गिरा देते हैं। ताकि पतियों द्वारा होने वाले वाष्पीकरण रुक जाए। इन वर्षों में साल, सागवान, एबोनी ,रोजवुड, आम ,हल्दु , शीशम , चंदन सेमल इत्यादि मुख्य वृक्ष है। उनकी लकड़ी बहुत ही मूल्यवान होती है। इन वनों का प्रदेशों का विस्तार ढक्कन का पठार मध्य भारत तथा उप हिमालय प्रदेश में पाया जाता है। 


मरुस्थलीय वनस्पति - भारत में मरुस्थलीय वनस्पति उन भागों में पाए जाते हैं। जहां वार्षिक वर्षा का औसत 50 सेंटीमीटर अथवा इससे भी कम हो। इन वनस्पति में कांटेदार वृक्ष एवं कंटीली झाड़ियां उगती है। इन प्रदेशों में वृक्ष वनस्पति का अभाव है। दूर दूर झाड़ियां और छोटे वृक्ष होते हैं किंतु इनकी जडें बहुत ही लंबी होती है। इनकी छाल मोटी और कड़ी होती है। पतियों पर बहुत सारे कांटे होते हैं। ताकि उन्हें जानवर ना खा सके और नहीं वाष्पीकरण करण अधिक होना हो पाए। कीकर , बबुल , खेजड़ी इत्यादि वृक्ष राजस्थान ,गुजरात तथा दक्षिणी पंजाब में मिलते हैं। 


डेल्टाई वन या दलदली वनस्पति - यह वन समुद्रतटीय भागों में मिलते हैं। जहां समुद्र का जल चढ़ आया करता है उन्हें ज्वारीय वन कहते हैं। यह बहुदा नदियों के डेल्टाई प्रदेशों में मिलते हैं। इसलिए इन्हें डेल्टाई वन भी कहा जाता है। इनमें मैनग्रोव, सुंदरी, कैसुरिना, ताड़ व नारियल के वृक्ष मिलते हैं। गंगा डेल्टा में सुंदरी वृक्ष की प्रचुरता के कारण गंगा डेल्टा प्रदेश के वन सुंदर वन कहलाते हैं। महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी इत्यादि नदियों में डेल्टाई वन मिलते हैं। पश्चिम बंगाल, उड़ीसा , आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु राज्य के तटीय भागों में यह वन पाए जाते हैं। 


पर्वतीय वन - ऊंचे भागों में विशेष प्रकार के वन मिलते हैं। जिम ऊंचाई के अनुसार परिवर्तन होता है। हिमालय के ढलानों ऊपर 1000 से 5000 मीटर की ऊंचाई तक पार्वती वनस्पति है। इनमें 1000 से 2000 मीटर तक मुख्यतः ओक , पाइन, और सागवान के वृक्ष है। 2000 से ढाई हजार मीटर तक देवदार की प्रधानता है। ढाई हजार से 3000 मीटर तक छोटी-छोटी झाड़ियां मिलती है। इससे ऊपर 5000 मीटर तक काई जैसे वनस्पति पाई जाती है। 



वनों के लाभ 

वन हमारे लिए लाभदायक होते हैं क्योंकि इसे अनेक प्रकार की उपयोगी लकड़ी तथा जलाने का ईंधन व पशुओं के लिए चारा प्राप्त होता है। रबर, कपूर ,दालचीनी ,लौंग इत्यादि गरम मसाले बिरोजा , तारपीन का तेल, सन्दल का तेल जैसी उपयोगी वस्तुएं मिलती है। 


वनों से कई प्रकार की औषधीय जड़ी बूटियां मिलती है तथा अनेक प्रकार का शिल्प उपयोगी सामान भी मिलता है। उदाहरण के लिए चमड़ा रंगना, कागज बनाना , दियासलाई बनाना , रबड़ का सामान बनाना , खेल का सामान बनाना , फर्नीचर बनाना , रेशम के कीड़े पालन इत्यादि अनेक शिल्पो का आधार वन है। लकड़ी काटने वाले, टोकरिया बनाने वाले, व लाख बनाने वाले सहस्त्रों लोग वनों से ही आजीविका कमाते हैं। अनेक प्रकार के जीव जंतुओं का ज्ञान भी प्राप्त होता है। 


इन लाभों के अतिरिक्त वन अपनी जड़ों के द्वारा धरातल की शैलों को अपरदन से बचाते हैं। जिससे वर्षा के जल , नदी नालों तथा वायु परवाह इत्यादि के विनाशक कार्यों का विशेष प्रभाव धरती पर नहीं पड़ता। घने वन धरती पर पड़ी वर्षा को आसानी से बहाने नहीं देते। जिससे कि ऐसे नदी नालों का प्रवाह , इसके स्रोत वनों के अंदर से हो नियंत्रित रहता है। इसके अतिरिक्त वन वायुमंडल में ठंडक उत्पन्न करते हैं। 

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