राजस्थान में प्राचीन सभ्यता स्थल

 राजस्थान में प्राचीन सभ्यता स्थल के बारे यहां जानें 

मानव जब खुद के बारे में सोचना छोड़कर दूसरो के बारे में सोचना शुरू कर देता है। तब वह ग्रुप मैं रहकर कार्य प्रारंभ करता है। इस सभ्यता की शुरुआत होती है

राजस्थान में प्राचीन सभ्यता स्थल
राजस्थान में प्राचीन सभ्यता स्थल


सभ्यता : व्यक्तियों का सामाजिक नियमों और व्यवहारों को जानना, उनका पालन करना, समाज के योग्य समुचित आचरण करना और समाज में अनुशासन में रहना। 

– उत्खनन से प्राप्त हुए प्राचीनतम साक्ष में आवास, स्थल, लकड़ी, अनाज, हड्डी और पत्थरों के अस्त्र शस्त्र और उपकरण प्रमुख है। अतः सर्वाधिक पत्थरों के उपकरणों के परमाओ की संख्या अधिक होने के कारण इस प्रारंभ युद्ध को ’ परस्तर युग’ कहा जाता है। 

–राजस्थान में परस्तर युग के उपकरण मुख्यतः बनास गंभीरी , बेडच और चंबल नदियों की घाटियों और गुफाओं से प्राप्त हुए हैं। 

- पाषाण युग के बाद तांबा - काॅंस्य तथा उसके पश्चात लोह युग के अवशेष प्राप्त होते हैं। 

- धातुओं में भी सर्वप्रथम तांबे का उपयोग प्रारंभ किया गया। 

- ताम्र सभ्यता के अवशेष राजस्थान में कालीबंगा( हनुमानगढ़ ) गणेश्वर ( सीकर ) और आहड़ ( उदयपुर ) आदि क्षेत्रों से प्राप्त हुए। 


कालीबंगा

  • राजस्थान में दृषद्वती एवं सरस्वती नदी घाटी में स्थित
  • इसकी खोज अमलानंद घोष ने की थी 
  • इस सभ्यता प्रमुख स्थल कालीबंगा घग्गर नदी के किनारे स्थित है। 
  • कालांतर में डॉ. बी.बी. लाल और बी.के. थापर के निर्देशन में यहां उत्खनन हुआ। 
  • इस सभ्यता में के मकान में ईटों का प्रयोग किया जाता था। 
  • जल निकासी के लिए यहां लकड़ी व ईंटों की नालियां बनी हुई थी। 
  • यहां चबूतरे भी मिले हैं जिन पर अग्निकुंड बने हुए हैं। 
  • कालीबंगा की नगरी योजना सिंधु सरस्वती सभ्यता की नगरी योजना के समान दिखाई देती है। 
  • जुते हुए कृषि भूमि के साक्ष्य से यहां पर मिले हैं। 
  • यहां से उत्खनन में गाय के मुख वाले प्याले , तांबे के बेल, कांस्य के दर्पण, हाथी दांत की कंगी, मिट्टी के बर्तन , कांच की मणियां, खिलौने आदि प्राप्त हुए हैं। 


आहड़

  • उदयपुर से पूर्व में बेडच नदी के किनारे दो टीले दिखाई देते हैं। जिसको स्थानीय लोग धूलकोट कहते हैं। 
  • यह ताम्र वती सभ्यता के नाम से जानी जाती है।  
  • यहां मकान की दीवारों पत्थरों एवं मिट्टी से बनी हुई है जिनकी छत बास और केलु से बनी होती थी। 
  • संयुक्त या सामूहिक परिवार के साक्ष्य से मिले हैं। 
  • आहड़ से प्राप्त भट्टी नुमा चूल्हे से ज्ञात होता है कि यहां तांबा पिघलाया जाता था। 
  • लाल व भूरे रंग के मृद्रभाण्ड़ प्राप्त हुए हैं। 
  • यहां से मिट्टी के बर्तन, खिलौने, 26 किस्म की मणियां, तांबे की मुहरें, व मुद्राये प्राप्त हुई है। 

  • बालाथल उदयपुर जिले के वल्लभनगर तहसील के बालाथल में अवस्थित है। 
  • ताम्र कालीन अथवा ताम्र पाषाण कालीन सभ्यता आहड़ संस्कृति से संबंधित है। 
  • यहां के निवासियों में मिश्रित अर्थव्यवस्था ( कृषि पशुपालन तथा शिकार ) प्रचलित थी। 
  • लोहा गलाने की भट्ठियों के प्रमाण मिले हैं। 
  • बेराट के अलावा बालाथल ही ऐसा स्थान है जहां बुना हुआ वस्त्र प्राप्त हुआ। 


गणेश्वर

  • सीकर जिले के नीमकाथाना तहसील में गणेश्वर में अवस्थित है। 
  • इस सभ्यता को ताम्र सचंई संस्कृति कहा जाता है। 
  • गणेश्वर में ताम्र उपकरणों के बहुतायत में मिलने का कारण खेतड़ी ताम्र भंडार की निकटता को माना जाता है। 

गणेश्वर में मिट्टी के दो प्रकार के बर्तन मिले हैं। 

  1.   - हड़प्पा पूर्व संस्कृति के हल्के लाल रंग के पतले बर्तन
  2.  - लाल चिकनी मिट्टी विशिष्ट चित्रकारी वाले मजबूत बर्तन इन बर्तनों में मर्तबान कलश प्याले तस्ल ढक्कन हांडी प्रमुख। 

आजाद एवं गणेश्वर सभ्यता ताम्र पाषाण कालीन संस्कृति थी किंतु उनके ऊपर स्तर पर लोहा युग के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। 


बैराठ

  • जयपुर जिले में स्थित बैराठ कस्बा हर युग में सभ्यता संस्कृति का प्रमुख केंद्र रहा है। 
  • यहां की बीजक पहाड़ी और भीम डूंगरी पुरातत्व की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। 
  • महाभारत काल में इसका उल्लेख मत्स्य जनपद की राजधानी विराटनगर के रूप में हुआ है। 
  • यहां अशोक के दो स्तंभ लेख ( भाब्रू या बैराठ अभिलेख ) एवं बौद्ध मठ के अवशेष प्राप्त होते हैं। 
  • इस सभ्यता में 36 चाबी की मुद्राएं मिली है जिनमें से 8 पंचमार्क 28 भारतीय यूनानी शासको की थी। 
  • उत्खनन में स्वास्तिक तथा त्रिरत्न चक्कर के चिन्ह् दीपक नाचता हुआ पक्षी , पत्थर के संदूके , लोहे 
  • की किले एवं हाथ से बने हुए वस्त्र मिले हैं। 





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